पठन और वाचन कौशल

           1.वाचन कौशल


🇮🇳वाचन कौशल(Vachan Kaushal) 🇮🇳


➡️वाचन या बोलना भाषा का वह रूप है जिसका सबसे अधिक प्रयोग होता है।

➡️भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का साधन साधारणतया उच्चारित भाषा ही होती है।

➡️जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वाचन\ बोलने की आवश्यकता होती है।  व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण उसकी मधुर वाणी है।

➡️वाचन एवं लेखन कौशल को अभिव्यंजनात्मक \  उत्पादक कौशल कहते हैं|


🌹🌹वाचन कौशल का महत्व🌹🌹


➡️विचारों के आदान-प्रदान के लिए।

➡️सरल , स्पष्ट एवं सहज बातचीत के लिए।

मौखिक भाषा के प्रयोग में कुशल व्यक्ति, अपनी वाणी से जादू जगह सकता है।

➡️सामाजिक जीवन में सामंजस्य तथा सामाजिक संबंधों के मुद्रण बनाने में वाचन कौशल प्रमुख भूमिका में होती है।

  


🌹🌹वाचन कौशल के उद्देश्य🌹🌹


➡️बालकों का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए।

➡️कक्षा में छात्रों को उचित स्वर, उचित गति के साथ बोलना सिखाना।

➡️छात्रों को सही व्याकरण वाली भाषा का प्रयोग करना सिखाना।

➡️कक्षा में छात्रों को लिसेन को ठोकर अपने विचार व्यक्त करने के योग्य बनाना।

➡️बोलने में विराम चिन्हों का ध्यान रखना  सिखाना।

छात्रों को धारा प्रवाह, प्रभावपूर्ण बानी में बोलना सिखाना।

➡️अवसर अनुकूल भाषा का प्रयोग करना सिखाना।

सरल सुबोध तथा मुहावरे दार भाषा का प्रयोग सिखाना।

➡️स्पष्टता वाचन कौशल का एक महत्वपूर्ण गुण होता है। बालकों को स्पष्ट भाषा प्रयोग करना सिखाना।

 


🌹🌹वाचन कौशल विकसित करने की शिक्षण विधियां🌹🌹


1 वार्तालाप-  शिक्षक को चाहिए कि वह प्रत्येक छात्र को वार्तालाप में भाग लेने के लिए प्रेरित करें। वार्तालाप का विषय छात्रों की मानसिक, बौद्धिक स्तर के अनुसार ही होना चाहिए।


2  सस्वर वाचन –  पहले शिक्षक को पाठ पढ़ाना चाहिए, बाद में छात्रों से सस्वर वाचन (बोल – बोलकर पढ़ाना) कराना चाहिए।


3   प्रश्नोत्तर-  शिक्षक को चाहिए कि वह छात्रों से पढ़ाए गए विषय के संबंध में प्रश्न उत्तर करें।


4  कहानी व कविता सुनाना- शिक्षक को छात्रों को वाचन कौशल के अंतर्गत कहानी एवं कविता सुनानी चाहिए।


5  चित्र वर्णन-  छोटी कक्षा के बच्चे चित्र देखने में रुचि देते हैं।  चित्र दिखाकर उसके बारे में छात्रों से पूछा जा सकता है।


 

6 वाद विवाद


7  नाटक प्रयोग


8  भाषण


9  समूह- विचार विमर्श, वर्णमाला  विधि, अक्षर विधि



🌹🌹वाचन के प्रकार🌹🌹


1 सस्वर वाचन –  बोल बोल कर( स्वर्ग के साथ)\ छोटी कक्षाओं हेतु


2 मौन वाचन-  मन- मन में\ बड़ी कक्षा के लिए


आदर्श वाचन-  पाठ पढ़ते समय जब शिक्षक स्वयं बोल- बोलकर पढ़ाता है तो उसे आदर्श वाचन कहते हैं।


अनुकरण वाचन-  जब छात्र शिक्षक द्वारा पढ़ाए गए पाठ का अनुकरण करके पाठ को बोल कर पढ़ते हैं, तो वह अनुकरण वाचन कहलाता है।


सावधानियां


1  शिक्षक स्वयं सही उच्चारण करें।


2  यदि कोई छात्र प्राकृतिक कारणों से शुद्ध उच्चारण पाता है, तो उसके माता-पिता को सूचित करें तथा उचित चिकित्सा करवाएं।


3  बोलने में कठिनाई अनुभव करने वाले छात्रों को अधिक से अधिक बोलने का अवसर प्रदान कराएं।


4  बालकों में  संकोच, झिझक, आदि ना आए।


5  बोलते समय छात्र सही स्वर,लय भावपूर्ण वाणी का ध्यान रखें,यह देखना चाहिए।



         2.पठन कौशल


🇮🇳 कौशल(Pathan Kaushal)🇮🇳


➡️साधारण अर्थ में पठन कौशल से तात्पर्य है कि लिखित भाषा को पढ़ना।

➡️भाषा कौशल में पठन कौशल का अर्थ है लिखी हुई भाषा को  उच्चारित करना तथा भाग को ग्रहण करना।

➡️भाषा शिक्षण में पठन कौशल पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है।  

➡️पठन ज्ञान प्राप्त करने का सबसे आसान एवं सरल तरीका है।


🌹🌹पठन कौशल के प्रकार🌹🌹

पठन कौशल के दो प्रकार होते हैं जो कि इस प्रकार है।


1 सस्वर पठन


2  मौन पठन


सस्वर पठन-  स्वर सहित पढ़ते हुए अर्थ ग्रहण करने को सस्वर पठन कहा जाता है वर्णमाला में लिपिबद्ध प्रणव  की पहचान सस्वर पठन के द्वारा ही कराई जाती है यह पठान की प्रारंभिक अवस्था होती है।


🌹🌹सस्वर पठन के गुण-🌹🌹


➡️सस्वर पठन करते समय  शुद्धता एवं स्पष्ट ता का ध्यान रखना चाहिए।

➡️ पठान  भावानुकूल करना चाहिए।

➡️विराम चिन्हों का ध्यान रखना चाहिए।

➡️सस्वर  पठन में आत्मविश्वास होना चाहिए।


🌹🌹सस्वर पठन को पुनः दो भागों में बांटा गया है।

1  वैयक्तिक पठान( individual reading)


2  सामूहिक पठन(Group reading)


  2 मौन पठन- लिखित सामग्री को चुपचाप बिना आवाज निकाले मन ही मन में पढ़ना मौन पठन कहलाता है।

🌹🌹मौन पठन के भेद ➡️➡️

मौन पठन के दो भेद होते हैं


1  गंभीर पठान(serious)


2 द्रतु पठन (quick)


🌹🌹गंभीर पठन🌹🌹


1   भाषा पर अधिकार करना।


2  केंद्रीय भाव की खोज करना।


3  विषय वस्तु पर अधिर  करना।


4  नवीन सूचना एकत्र करना। 


🌹🌹द्रतु पठन🌹🌹


1 सीखी हुई भाषा का अभ्यास करना।


2 खाली समय का सदुपयोग करना।


3  आनंद प्राप्त करना।


4  सूचनाएं एकत्रित करना तथा साहित्य का परिचय प्राप्त करना।


🌹🌹पठन कौशल का महत्व🌹🌹


➡️यह विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायक है छात्र शुद्ध उच्चारण सीख सकते हैं।

➡️शब्द भंडार में वृद्धि करने में सहायक होता है।

➡️व्याकरणिक ज्ञान में वृद्धि करने में सहायक।

➡️महान व्यक्तियों की जीवनी एवं आत्मकथा ए पढ़कर उनके आदर्श गुणों का आत्मसात कर सकता है।

➡️नवीन पुस्तकों को बहकर नवीन जानकारी प्राप्त कर सकता है।

➡️पढ़कर समय का सदुपयोग कर सकता है।



पठन कौशल के उद्देश्य


1  बालकों को सही स्वार्थ तथा भाव के अनुसार पढ़ाना सिखाना तथा भाव को ग्रहण करना चाहिए।


2  शुद्ध पठन सिखाना।


3 पठान के द्वारा छात्र विराम चिन्ह, अर्धविराम आदि चिन्हों का प्रयोग समाज जाता है।


4  पठन से स्वाध्याय की प्रवृत्ति जागृत करना।


5  सही उच्चारण,, ध्वनि, उचित बल आदि पठन से छात्र सीख जाता है।


6  पठन से शब्द भंडार में वृद्धि होती है।


🌹🌹 पठन कौशल की शिक्षण विधियां 🌹🌹


1   वर्णबोध विधि –  इसमें पहले वर्णनो का ज्ञान कराया जाता है।  स्वर पहले, व्यंजन बाद में फिर मात्राओं का ज्ञान कराया जाता है।


2  ध्वनि साम्य विधि – इसमें समान उच्चारण वाले शब्दों को साथ साथ सिखाया जाता है।


3   स्वरोच्चारण विधि – इसमें 12 कड़ी को आधार माना जाता है,क ,का ,के ,की ,कि,को इस विधि में अक्षरों एवं शब्दों को उनकी स्वर ध्वनि के अनुसार पढ़ाया जाता है।


4 देखो और कहो विधि-  इसमें शब्द से संबंधित चित्र दिखाकर शब्द का ज्ञान कराया जाता है।  यह विधि मनोवैज्ञानिक है। कई बार देखने सुनने और बोलने से वर्णो के चित्र मस्तिष्क पर अंकित हो जाते हैं।


5  वाक्य विधि-  इस विधि में वाक्य या वाक्यांशों में बालक बोलता है।  पहले वाक्य फिर शब्द, फिर वर्ण- इस प्रकार क्रम में बच्चों को पढ़ाना सिखाया जाता है।


6 कहानी विधि-  इस विधि में बच्चों को कहानी सुनाई जाती है।


7  अनुकरण विधि-  यह विधि “देखो और कहो” विधि का दूसरा स्वरूप है।  इसमें अध्यापक एक-एक शब्द बालकों के समक्ष कहता है, और छात्र उसे दोहराते हुए अनुकरण करते हैं।  इस प्रकार छात्र शब्द ध्वनि का उच्चारण एवं पढ़ना सीखते हैं


🌹🌹 महत्व एवं गुण-🌹🌹


थकान कम होती है तथा मन नेत्र एवं मस्तिक से सक्रिय रहते हैं।

मौन पठन में पाठक एकाग्रता तथा ध्यान केंद्रित करके पड़ता है।

यह कक्षा में अनुशासन बनाए रखने में सहायक है।

स्वाध्याय की रुचि जागृत करने में सहायक।

चिंतन करने तथा गहन अध्ययन करने में भी सहायक है।


🌹🌹 पठन संबंधित त्रुटियां🌹🌹


1  अटक अटक कर पढ़ना।


2  अनुचित मुद्रा, पुस्तक को आंखों के निकट या दूर रखना।


3  अशुद्ध उच्चारण।


4  अनियमित गति।


5  भाव के अनुसार आरोह- अवरोह का अभाव।


                मूल्यांकन


1. श्रवण कौशल का मूल्यांकन - श्रवण कौशल के मूल्यांकन हेतु ध्यानपूर्वक देखने वाली चीज़ें होती हैं: सुनने में शिष्टाचार का पालन, ध्यानपूर्वक सुनना, ग्रहणशीलता, वक्ता के मनोभावों की समझ, शब्दों और वाक्यों का संदर्भानुकूल अर्थ समझना, भाषा व् शैली की दृष्टि से साहित्यिक अंशों में तुलना, श्रुत सामग्री के आकर्षक स्थलों की पहचान, आदि।इन्ही सब कारकों के परख कर जांचा जा सकता है कि बालक श्रवण कौशल में कितना कुशल है और किस स्तर पर है।

2. वाचन कौशल का मूल्यांकन - वाचन कौशल अर्थात मौखिक अभिव्यक्ति के कौशल के जांचने हेतु ध्यान देने वाले पहलु हैं: सुश्रव्य वाणी में बोल पाना, उचित लय, हाव-भाव, उतार-चढ़ाव, गति एवं प्रवाह के साथ बोल पाना, शब्दों की सही क्रमबद्धता की पहचान, विषय से न भटकना, सही व्याकरणिक भाषा का प्रयोग, सही शब्दों का चयन कर प्रभावी रूप से विचारों के रखना, आदि।

3. पठन कौशल का मूल्यांकन - पठन कौशल का सही मूल्यांकन माध्यमिक स्तर से शुरू होता है। प्राथमिक स्तर पर यह अनिवार्य नहीं होता। उस स्तर पर श्रवण और वाचन कौशल अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। पठन कौशल से तात्पर्य है पढ़ी गयी सामग्री के सही अर्थ को समझ पाना।इस कौशल के मूल्यांकन हेतु विभिन्न कारकों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। जैसे - पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त अन्य साहित्यिक विधायें पढ़ने की उत्सुकता, शब्दों-वाक्यों का प्रसंगानुकूल सही भाव-ग्रहण, पठित अंश की अपनी भाषा में अभिव्यक्ति, निजी संवाद के निर्माण की क्षमता, पढ़ी गयी सामग्री का सही विश्लेषण करने की क्षमता, आदि।

4. लेखन कौशल का मूल्यांकन - आजकल मूल्यांकन में लिखित कौशल पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है। विद्यालयों में भी मूल्यांकन का आधार लिखित परीखा ही मानी जाती है। परन्तु उसके पश्चात भी बच्चों की लेखन शैली संतोषजनक नहीं है। इसका सबसे प्रमुख कारण है कि सही मापदंड तैयार नहीं किये जाते।लेखन कौशल के मूल्यांकन हेतु निम्न पक्षों को ध्यान में रखना चाहिए - शुद्ध वर्तनी, क्रमबद्ध लेख, अभिव्यक्ति हेतु सही शैली और विधि का प्रयोग, विराम चिन्हों का सही प्रयोग, उचित गति और आकार में लिखना, परिस्थिति के अनुसार सही शब्दों, मुहावरों, अलंकारों का प्रयोग, विचारों का सुनियोजित तरीके से प्रकाशन, सृजनात्मक लेखन, उचित शब्दावली का प्रयोग, बिना किसी सम्प्रदाय या जाति को हानि पहुंचाए सामजिक विचारों का भाव प्रकाशन, आदि।

भाषा कौशलों के सही मूल्यांकन के द्वारा ही पता लगाया जा सकता है कि विद्यार्थी के भाषा विकास का स्तर, उसकी गति क्या है, कहाँ सुधार की आवश्यकता है और उसके निदान हेतु उपचार की आवश्यकता विद्यार्थी को ही है या शिक्षक को भी अपनी शिक्षण विधियों में सुधार की आवश्यकता है। इन सभी चीज़ों को ध्यान में रखने से ही भाषा विकास का कार्य सही दिशा ले पता है।



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